जयपुर/जोधपुर, 11 अगस्त। राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के प्रसिद्ध जीरे और आबू की सौंफ को लेकर GI टैग का विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है। गुजरात की ऊंझा APMC को ‘ऊंझा जीरा’ और ‘ऊंझा सौंफ’ के नाम से GI टैग दिए जाने पर राजस्थान के किसान, व्यापारी और कृषि विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं।
जोधपुर के जीरा व्यापारियों का कहना है कि GI टैग उत्पादन क्षेत्र की पहचान से जुड़ा होना चाहिए, केवल उस मंडी से नहीं जहां कृषि उपज का बड़ा कारोबार होता है। उनका दावा है कि मारवाड़ में पैदा होने वाला जीरा ही इसकी वास्तविक भौगोलिक पहचान का आधार है।
इस मामले में दक्षिण एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर, जोधपुर की ओर से GI रजिस्ट्री के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई गई है। संस्था का कहना है कि ऊंझा देश की बड़ी मसाला मंडी जरूर है, लेकिन जीरा और सौंफ के उत्पादन की भौगोलिक पहचान राजस्थान से जुड़ी है। मारवाड़ के जीरे के लिए अलग GI टैग की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है।
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सौंफ को लेकर भी उठे सवाल
विवाद केवल जीरे तक सीमित नहीं है। आबू क्षेत्र की सौंफ को लेकर भी राजस्थान की ओर से आपत्ति जताई गई है। विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि किसी उत्पाद की पहचान केवल व्यापारिक मंडी के आधार पर तय की जाएगी, तो वास्तविक उत्पादक किसानों के अधिकार और क्षेत्रीय पहचान प्रभावित हो सकती है।
IPM जीरे ने बनाई अलग पहचान
पश्चिमी राजस्थान में वैज्ञानिक खेती और Integrated Pest Management (IPM) मॉडल से तैयार होने वाले अवशेष-मुक्त जीरे की मांग देश-विदेश में बढ़ रही है। किसानों का कहना है कि मारवाड़ के जीरे की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता उसकी अलग पहचान है। ऐसे में GI टैग को लेकर चल रहा विवाद किसानों के लिए महज सम्मान का नहीं, बल्कि भविष्य के बाजार और उत्पाद की ब्रांड वैल्यू का भी सवाल बन गया है।
राजस्थान के किसान और व्यापारी अब सरकार से मांग कर रहे हैं कि मारवाड़ के जीरे और आबू की सौंफ की भौगोलिक पहचान सुरक्षित करने के लिए प्रभावी कानूनी पैरवी की जाए।