बाड़मेर: जयपुर से मुझे इस बारे में कल पहली बार पता चला जब जयपुर से धर्मेन्द्र राठौड़ साहब का फोन आया कि वे सोशल मीडिया दिवस पर एक कार्यक्रम कर रहे हैं। उन्होंने कार्यक्रम का निमंत्रण भी दिया धन्यवाद। हालांकि मैं निजी कारणवश कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाया। हालांकि बड़ी इच्छा हुई जाने की। खैर। पता नहीं किसने आज की तारीख को सोशल मीडिया दिवस घोषित किया है और क्या सोचकर घोषित किया है। इसका उद्देश्य क्या है, यह भी पता नहीं है क्योंकि आमजन से लेकर खासजन तक हर दिन सुबह से लेकर रात तक सोशल मीडिया दिवस ही तो मनाता है। सबके अपने-अपने पसंदीदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं और हर कोई दिनभर इन्हीं में खोटी होता रहता है। फिर अलग से सोशल मीडिया दिवस की जरूरत क्यों पड़ी, समझ में नहीं आया।
यह तस्वीर उसी कार्यक्रम की है। सोशल मीडिया को लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ के रूप में स्थापित किया जा रहा है। स्वीकार भी कर ही लिया जाएगा। हर चीज के फायदे भी हैं और खतरे भी। सोशल मीडिया ने भी बड़ी क्रांति की है। जो चीजें/बातें/घटनाएं रिपोर्ट तक नहीं हो पाती थीं, वो अब प्रमुखता से और बड़ी तेज़ी से हो रही हैं। फायदा भी हो रहा है लेकिन बहुत सी चीजें गलत तरीके से भी रिपोर्ट हो जाती हैं। इसके फायदों और नुकसानों का अभी तक कोई प्रामाणिक समाजशास्त्रीय अध्ययन सामने नहीं आया है। हां, सोशल मीडिया दिवस पर हम अनर्गल बातों, फ़ूहड़ बयानों, नफ़रत फैलाने वाले कंटेंट आदि को भाव नहीं देने का संकल्प जरूर ले सकते हैं। बाकी सोशल मीडिया फिलहाल इतनी ज्यादा तेजी पर है कि इसे किसी दिवस की जरूरत नहीं है। करना ही है तो कोई “नो सोशल मीडिया दिवस” टाइप की चीज कर सकते हैं। सभी सामूहिक रूप से संकल्प लें कि उस पर्टिकुलर दिवस पर सोशल मीडिया का बिल्कुल भी उपयोग नहीं करेंगे। और यह दिवस महीने में कम से कम चार बार मनाया जाए। वरना सामूहिक रूप से बीमार होने के खतरे ज्यादा हैं