आबूरोड: ब्रह्माकुमारीज़ की प्रथम मुख्य प्रशासिका मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) का 61वां पुण्य स्मृति दिवस मनाया

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मम्मा कहती थीं हर घड़ी अंतिम घड़ी है: राजयोगिनी बीके मुन्नी दीदी

संस्थापक ब्रह्मा बाबा ने प्रथम प्रशासिका के रूप में किया था नियुक्त

आबूरोड। ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान की प्रथम मुख्य प्रशासिका मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) का 61वां पुण्य स्मृति दिवस मुख्यालय शांतिवन में आध्यात्मिक ज्ञान दिवस के रूप में मनाया गया। उनकी याद में ब्रह्ममुहूर्त से देर रात तक योग-तपस्या का दौर जारी रहा। वहीं सुबह 8 बजे डायमंड हाल में पुष्पांजली कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें संस्थान के सभी वरिष्ठ पदाधिकारियों ने मम्मा के साथ के अनुभव सांझा करते हुए पुष्पांजली अर्पित की। साथ ही देशभर से आए तीन हजार से अधिक भाई-बहनों ने अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए।

श्रद्धांजली कार्यक्रम में अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी मुन्नी दीदी ने कहा कि मम्मा सदा कहती थीं हर घड़ी अंतिम घड़ी है। इसलिए वह सदा अलर्ट, एक्यूरेट रहती थीं। बाबा का कहना और मम्मा का करना, यह विशेषता थी। कैसी भी परिस्थिति आई लेकिन मम्मा ने गंभीरता, धैर्यता के साथ सामना किया।

अमृतसर में वर्ष 1919 में हुआ था जन्म-

वर्ष 1919 में अमृतसर के साधारण परिवार में मम्मा का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम ओम राधे था। जब आप ओम की ध्वनि का उच्चारण करती थीं तो पूरे वातावरण में गहन शांति छा जाती थी, इसलिए भी आप ओम राधे के नाम से लोकप्रिय हुईं। आप बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और प्रतिभावान थीं। ब्रह्मा बाबा ने कोई भी ज्ञान की बात आपको कभी दोबारा नहीं सिखाई। आप एक बार जो बात सुन लेती थीं, उसी समय से अपने कर्म में शामिल कर लेती थीं। 24 जून 1965 को आपने अपने नश्वर देह का त्याग करके संपूर्णता को प्राप्त किया था।

1965 तक मुख्य प्रशासिका की निभाई जिम्मेदारी-

महासचिव बीके करुणा भाई ने कहा कि प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की वर्ष 1937 में स्थापना के समय संस्थापक ब्रह्मा बाबा ने जब माताओं-बहनों के नाम एक ट्रस्ट बनाया तो उसकी जिम्मेदारी सबसे पहले मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती (मम्मा) को दी गई थी। तब से लेकर 24 जून 1965 तक आपने इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की बागडोर बड़ी ही कुशलता के साथ निभाई। कम उम्र होने के बाद भी आपका गंभीर व्यक्तित्व और ज्ञान की गहराई से सभी अचंभित रह जाते थे। 24 जून 1965 को मम्मा के अव्यक्त होने के बाद ब्रह्मा बाबा ने राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि को संस्थान की कमान सौंपी थी।

अतिरिक्त महासचिव डॉ. बीके मृत्युंजय भाई ने कहा कि मम्मा का जीवन आदर्श और त्यागमूर्त था। मम्मा का जीवन हमें सिखाता है कि यदि मनुष्य पवित्रता, विनम्रता, सहनशीलता और परमात्मा के प्रति सम्पूर्ण समर्पण को अपनाए, तो वह स्वयं के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का माध्यम बन सकता है। उनका जीवन वास्तव में ज्ञान, योग, धारणा और सेवा का जीवंत संगम था।

इस मौके पर मीडिया विंग के उपाध्यक्ष बीके आत्म प्रकाश भाई, गीता ज्ञान विशेषज्ञ बीके ऊषा दीदी, डॉ. सविता दीदी, मेडिकल विंग के सचिव डॉ. बनारसी भाई, वरिष्ठ राजयोगी बीके प्रकाश भाई, आवास निवास के प्रभारी बीके देव भाई, सहित देश-विदेश से आए तीन हजार से अधिक भाई-बहनें मौजूद रहे।

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