सिंदरथ में धूमधाम से शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा; भव्य कलश यात्रा में उमड़ा जनसैलाब
भक्तिमय गीतों और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रामेश्वर महादेव मंदिर में भागवत जी की स्थापना
सिरोही, 5 जुलाई। ( रिपोर्टर, महेंद्र सिंह परिहार ) समीपवर्ती गांव सिंदरथ के ऐतिहासिक रामेश्वर महादेव मंदिर में रविवार से सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का भव्य शुभारंभ हुआ। आयोजन को लेकर सुबह से ही ग्रामीणों और संत गरीबदास जी महाराज की भक्त मंडली में अभूतपूर्व उत्साह देखा गया। इस धार्मिक अनुष्ठान के पहले दिन सिरोही शहर से सिंदरथ गांव तक एक विशाल एवं भव्य कलश व पोथी यात्रा निकाली गई।
भव्य कलश यात्रा और पारंपरिक वेशभूषा
कलश यात्रा का शुभारंभ सिरोही के पैलेस रोड स्थित आपेश्वर महादेव मंदिर से हुआ। विद्वान पंडितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ कलश और श्रीमद्भागवत ग्रंथ का विधि-विधान से पूजन किया गया। इसके बाद यह यात्रा श्री मुरलीधर जी मंदिर होते हुए शहर के मुख्य मार्गों से गुजरी। यात्रा में पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में सजे पुरुष और सिर पर मंगल कलश व श्रीमद्भागवत पोथी धारण किए महिलाएं शामिल हुईं। महिलाएं मार्ग भर मंगल गीत गाती हुई सिंदरथ गांव स्थित कथा स्थल पर पहुंचीं। कथा स्थल पर पंडितों ने गणपति पूजन और ठाकुर जी की विशेष आराधना के बाद भागवत जी को व्यासपीठ पर स्थापित किया। आयोजक परिवार द्वारा कथाव्यास पंडित जनार्दन ओझा का माल्यार्पण कर भावभीना स्वागत किया गया।
व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते प्रख्यात कथावाचक पंडित जनार्दन ओझा।

श्रीमद्भागवत जीवन की सही दिशा दिखाती है: कथाव्यास
कथा के प्रथम दिन व्यासपीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पंडित जनार्दन ओझा ने मंगलाचरण के साथ भगवान नारायण, महर्षि वेदव्यास और शुकदेव जी महाराज की वंदना की। उन्होंने कहा:
”श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात कृष्ण का वांग्मय स्वरूप है। यह कथा मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य और सही दिशा का बोध कराती है। जिस क्षेत्र में भागवत कथा का श्रवण होता है, वहां से नकारात्मक और दुष्ट प्रवृत्तियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं और संपूर्ण वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर हो जाता है।”
सत्संग और कुसंग का भेद समझाया
पंडित ओझा ने ‘निष्काम भक्ति’ पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बिना किसी सांसारिक इच्छा या स्वार्थ के की गई भक्ति ही मनुष्य के मोक्ष और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। सत्संग की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि जो हमारे मन को विनम्र करे, ईश्वर के करीब ले जाए और नाम-जप में रुचि बढ़ाए, वही सच्चा सत्संग है।
इसके विपरीत, उन्होंने श्रद्धालुओं को कुसंगति से बचने की कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुसंग केवल बुरे लोगों का साथ नहीं है, बल्कि वे विचार, बातें और आदतें भी कुसंग हैं जो हमें ईश्वर से विमुख कर काम, क्रोध, लोभ और अहंकार की ओर धकेलती हैं। सत्संग से जीवन में श्रद्धा और वैराग्य आता है, जबकि कुसंग मन को अशांत कर अधर्म की राह पर ले जाता है।
इस भव्य धार्मिक प्रसंग के पहले दिन स्थानीय ग्रामीणों सहित यजमान परिवार और दूर-दराज से आए बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय हो गया।